बच्चों को सैक्स के विषय में कब और कैसे समझाएँ?

बच्चों का पालन-पोषण करते हुए हमारे जीवन में कई बार ऐसे मौके आते हैं जब बाल-जिज्ञासा हमें अजीबो-गरीब स्थिति में डाल देती हैं। परेशानी यह नहीं होती कि बच्चे सवाल क्यों पूछ रहे है क्योंकि ये तो हम जानते ही हैं कि जिज्ञासावश वे तो प्रश्न करेंगे ही और स्वच्छ बौद्धिक विकास के लिए यह आवश्यक भी है।अतः बालकों को प्रश्न करने ही चाहिएँ।

परंतु परेशानी आती है जवाब देने की। बच्चे हमसे सत्य उत्तर की अपेक्षा रखते हैं। अब हमारा भी यह दायित्व बन जाता है कि बच्चों को सही उत्तर दें और उनकी जिज्ञासाओं को तृप्त करके शांत करे। उनकी आयु के अनुसार ही सत्य परंतु शालीन उत्तर दें जिससे बच्चों की मासूमियत भंग न होने पाए और उनका सर्वांगीण विकास भी भली भाँति हो सके तथा हमारे तथ्य भी पूर्णरूपेण सत्य हों। यह आवश्यक नहीं कि बालमन को हम पूरी विधिवत जानकारी दें। बल्कि हमारा उत्तर ऐसा होना चाहिए जो छोटा हो,पर सत्य और सुरक्षित हो तथा हमारी मान्यताओं पर आधारित हो।

ऐसा ही एक प्रश्न है “हम दुनिया में कैसे आए?”

शायद ही कोई बच्चे हों जिनको कभी न कभी मन में यह प्रश्न न उठा हो कि वो कहाँ से आए ?या इस प्रश्न का उत्तर जानने की उत्सुकता न हुई हो। मेरे बच्चों ने भी ऐसा प्रश्न मुझसे किया था। बच्चों को बच्चों के तरीके से ही समझाना पड़ता है। मैने भी उन्हें बहुत प्यार से समझाया।

दरअसल एक बार हम अपनी शादी की फोटो एलबम देख रहे थे। बच्चे भी साथ ही बैठे थे। तब यही कोई चार-पाँच साल की उम्र रही होगी बच्चों की। एलबम देखते हुए हम फोटोज़ के विषय में भी बच्चों को बता रहे थे। उन फोटोज़ में कुछ छोटे बच्चे भी थे जो हमारे अन्य रिश्तेदारों के बच्चे थे और जिनके साथ आज के समय में हमारे बच्चे भी खेलते थे। हमारी शादी की एलबम में अपने अलावा बाकी सबकी फोटोज़ बच्चों को दिखाई दे रही थीं।

काफी देर तक सब्र करते हुए वे फोटो देखते रहे। पर जब बहुत देर तक एलबम में उनकी फोटो कहीं भी नहीं आई तो वे दोनों बेचैन हो गए और तब शुरू हुई उनके सवालों की झड़ी।

“मम्मा इसमें सबकी फोटो हैं पर हमारी तो कोई फोटो है ही नहीं। आपने हमारी फोटो क्यों नहीं खीची थी? इसमें हम कहाँ है?”

मैने उन्हें समझाया कि हमारी शादी के समय तो आप लोग पैदा ही नहीं हुए थे। आप लोग तो शादी के बाद आए थे।

“हम शादी के बाद आए थे?”

“हाँ”

“तो हम इससे पहले कहाँ थे?”

“पता नहीं।शायद भगवान जी की गोदी में होंगे।”

“अच्छा? फिर हम आपके पास कैसे आए?”

“आपके पापा तो काम करने चले जाते थे ऑफिस।फिर मैं तो घर में अकेली रह जाती थी। तो मेरा तो मन ही नहीं लगता था। तो मैने और आपके पापा ने मिलकर भगवान जी से कहा कि भगवान जी हमें दो छोटे-छोटे खिलौने दे दो। एक छोटी-सी, प्यारी-सी,सुंदर-सी, कोमल-सी गुड़िया और एक छोटा-सा, नन्हा सा, प्यारा-सा, नटखट-सा, गुड्डा। भगवान जी ने हमसे कहा कि दे तो दूँगा पर आप दोनों को मिलकर उन दोनों छोटे बच्चों को बहुत प्यार से रखना पड़ेगा और उनका बहुत ध्यान रखना पड़ेगा। अगर दंगा करें तो थोड़ा -सा डाँटना भी पड़ेगा और कहना माना करें तो प्यार भी करना और कुछ चीज़ भी देना खाने को। आपको शर्त मंज़ूर हो तो बताओ। मैं दे दूँगा।हमने कहा ‘हाँ ‘हमें मंज़ूर है। फिर एक दिन हमने देखा कि बाहर छत पर बारिश हो रही थी। भगवान जी ने ऊपर से हमें आवाज़ लगाई और कहा कि झोली बना लो मैं एक गुड़िया ऊपर से बारिश के साथ देने वाला हूँ। तुम दोनो़ ध्यान से पकड़ लेना। थोड़े टाइम के बाद मैं एक गुड्डा भी दूँगा।तब उसे भी ऐसे ही सम्भाल लेना। हम तैयार हो गए। तभी ऊपर आसमान से बारिश के साथ एक छोटी-सी गुड़िया आई और हमने उसे अपनी गोदी में रख लिया और अपने घर में ले आए। फिर थोड़े टाईम बाद ऐसे ही एक छोटा-सा गुड्डा हमें दे दिया। हम उसे भी लेकर आ गए अपने घर में। तब से हमारे पास तुम दोनों हो।” मैं बोली।

तब जाकर कहीं उनकी जिज्ञासा शांत हुई और दोनों ने इस बात को माना कि ‘हाँँ, शादी के समय उनकी फोटोज़ शामिल नहीं की जा सकती थीं क्योंकि वो दोनों उस समय हमारे पास नहीं थे।😊😊

इस प्रश्न के कई उत्तर हो सकते हैं जो बच्चों को समझाने के लिए दिए जा सकते हैं। जो हर माँ-बाप अपने तरीके से बच्चे को बताते हैं।

मेरा उत्तर कहने को काल्पनिक कथा जैसा था। बहुत से लोगों को लगता है कि बच्चों को सच्चाई से अवगत कराना चाहिए।उन्हें ऐसे उत्तर नहीं देना चाहिए।इससे वे भ्रमित हो जाते हैं तथा अज्ञानी रह जाते हैं।परंतु मैं ऐसा नहीं मानती।

मुझे लगता है छोटे बच्चे बहुत मासूम होते हैं।वे कल्पनाओं की दुनिया में खोए रहते हैं। उन्हें ऐसी काल्पनिक कहानियां ही जल्दी समझ आती हैं।अतः उन्हें समझाने के लिए इसी तरह के उत्तर देना उचित होता है।इससे इनकी मासूमियत और कल्पनाशीलता भी बनी रहती है तथा उन पर मानसिक तौर पर कोई बुरा प्रभाव भी नहीं पड़ता।

इसके विपरीत यदि छोटे बच्चों को बड़े और गहरे उत्तर बताए जाएँ तो इसके कई दुष्परिणाम हो सकते हैं।

1)-न तो वे उसे समझ पाएँगे।जिसके कारण उनके मन में ढेरों और प्रश्न जन्म लेंगे।और जवाब न मिलने की सूरत में उत्तर की तलाश में वे इधर उधर भटकते फिरेंगे।

2)- छोटी-सी आयु में बड़े उत्तर बच्चों को मानसिक रूप से विक्षिप्त और पथभ्रष्ट बना सकते हैं।

3)बच्चों की मासूमियत और कल्पनाशीलता का हनन होता है।

4)बच्चे अशिष्ट हो जाते हैं।

5)-माता-पिता और बच्चों के बीच एक शर्म और लिहाज का पर्दा होता है जो छिन्न-भिन्न हो जाता है।

6)- मेरे विचार से तो बच्चों द्वारा पूछे गए ऐसे प्रश्नों के उत्तर इसी प्रकार काल्पनिक रूप में देना उचित है। उन्हें जीवन की सच्चाई की गहराइयों मे धकेलने की जल्दबाज़ी करना ठीक नहीं। समय आने पर उम्र के साथ कुछ बातें उन्हें स्वतः ही समझ आने लगती हैं। बाकी कुछ बातों को वक़्त पर भी छोड़ देना चाहिए।

एक निश्चित आयु जो लगभग 8-12 वर्ष की हो सकती है जब बच्चे तकरीबन सभी बातें समझने योग्य हो जाते हैं। तब हम धीरे-धीरे उन्हें यह बता और समझा सकते हैं कि यह एक शारीरिक प्रक्रिया है जो कुछ नियमों का पालन करते हुए एक निश्चित आयु के पश्चात् होती है। इसमें माता केगर्भाशय में बेबी बनता है। ये ईश्वर का आशीर्वाद होता है जो माता-पिता को सच्चे मन से प्रेम करने पर ईश्वर देते हैं। फिलहाल इतना तक समझाया जा सकता है।

इसकी पूरी जानकारी सही समय आने पर माता-पिता द्वारा बच्चों को दी जानी चाहिए। इससे अपनी किशोरावस्था तक आते हुए उन्हें इस विषय में अच्छी और शुद्ध जानकारी प्राप्त होगी।

आवश्यक हो तो बच्चों के साथ बैठकर शांत भाव से बच्चों के समक्ष इस विषय को एक सहज प्रक्रिया के रूप में बताना चाहिए। तब बच्चे समझ भी सकेंगे तथा इधर-उधर से प्राप्त अधकचरे ज्ञान के कारण भटकेंगे भी नहीं।

बच्चों को शालीनता पूर्वक मर्यादित तरीके से सिखाने की ज़िम्मेदारी माता-पिता दोनों को बराबर निभानी चाहिए।

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