• वेस्ट यूपी में भाजपा का विजय रथ रोक देगा रालोद का यह प्लान

    item-thumbnail  मुजफ्फरनगर। यूपी में मुजफ्फरनगर दंगे के बाद से बिखरे हुए जाट-मुस्‍लिमों को मिलाने की राष्ट्रीय लोकदल की कोशिश और सपा-कांग्रेस-रालोद का गठजोड़ यूपी में कोई नया गुल खिला सकता है। जाट आरक्षण और हरित प्रदेश के मुद्दे से जूझ रही भाजपा की परेशानी में रालोद की कोशिशों से और इजाफा हो सकता है। पहले चरण के चुनाव में की बात करें तो इसके 15 जिलों में सपा के पास 24 सीटें हैं। ऐसे में गठबंधन से ये आंकड़ा बढ़ सकता है। जाट आंदोलन से जूझ रही भाजपा के पास इस क्षेत्र से अभी 13 सीटें हैं।
     अगस्‍त 2013 में मुज़फ्फरनगर के दंगे के बाद से जाट और मुस्‍लिमों में बिखराव आ गया था। कभी राजनीतिक ही नहीं कारोबार और खेती-किसानी में भी साथ-साथ कदम बढ़ाने वाले जाट-मुस्‍लिम एकदम से अलग हो गए। यहां तक कि अपनी-अपनी नाराजगी के चलते कारोबार में नुकसान मंजूर था, लेकिन एक-दूसरे से बातचीत करना जरूरी नहीं समझा। सियासत की बात करें तो इसका सबसे ज्‍यादा खामियाजा रालोद को उठाना पड़ा। 2012 के विधानसभा चुनावों में रालोद ने नौ सीट जीती थीं। अलीगढ़ की तीन और मथुरा की तीन सीट की बात छोड़ दें तो रालोद को मुज़फ्फरनगर में एक, गाजियाबाद में एक और रालोद का गढ़ बागपत की छपरौली सीट मिली थीं।
     2012 के सियासी नतीजों और मुज़फ्फरनगर के दंगों से सबक लेते हुए रालोद ने जमीनी स्‍तर पर जाट-मुस्‍लिमों को एकजुट करना शुरू कर दिया है, यही उसका कोर वोट है। सूत्रों की मानें तो मेरठ, शामली, बागपत और मुज़फ्फरनगर में बैठकें आयोजित की जा रही हैं। एक ही हुक्‍के के इर्द-गिर्द बैठकर सारी पुरानी बातें भुलाई जा रही हैं। आपसी सहमति से जाट और मुस्‍लिम उम्‍मीदवार तय कर रहे हैं। पश्‍चिमी उत्‍तर प्रदेश में इस वक्‍त सबसे बड़ा मुद्दा हाईकोर्ट बेंच का है। इस मुद्दे पर सभी दल एक सुर में सहमति तो देते हैं, लेकिन अभी तक हुआ कुछ नहीं। हरित प्रदेश के मुद्दे पर बसपा और रालोद के अलावा सभी दल चुप्‍पी साधे हुए हैं। पिछली बार सत्‍ता से जाते-जाते बसपा प्रमुख मायावती ने ये मुद्दा छेड़ दिया था जिससे ये मांग अब केन्‍द्र के पाले में पड़ी हुई है। 2012 के चुनाव में 15 जिलों से बसपा को 23 सीटें मिलना शायद इसी का असर माना जा रहा है। केंद्रीय नौकरियों में जाटों के लिए आरक्षण, हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन के पीड़ित जाटों को मुआवजा, जाटों पर टिप्‍पणी करने वाले सांसद राजकुमार सैनी पर कार्रवाई की मांग भी यहां मुद्दा है।
     जानकार बताते हैं कि पश्‍चिमी यूपी की करीब 125 ऐसी सीटें हैं जहां जाट वोट निर्णायक भूमिका में रहते हैं। आगरा, अलीगढ़, मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद और बरेली ऐसे मंडल हैं जहां से 2012 में छह जाट उम्‍मीदवार विधायक बने लेकिन इससे पहले ये आंकड़ा 15 से ऊपर ही रहता था। पहले चरण में 15 जिलों की 73 विधानसभा सीट पर मतदान होना है। 2012 के आंकड़ों को देखें तो सपा को 24, बसपा को 23, भाजपा को 13, रालोद को नौ और कांग्रेस को पांच सीटें मिली थीं। मथुरा की मांट सीट उपचुनाव के दौरान भाजपा के खाते में जा चुकी है। वहीं मथुरा की गोवर्धन सीट से रालोद विधायक भाजपा में शामिल हो चुका है। इसी तरह से अलीगढ़ की बरौली विधानसभा से रालोद विधायक भी भाजपा में शामिल हो चुका है। इस क्षेत्र से चन्‍द्र भानु गुप्‍ता, चौधरी चरण सिंह, बनारसीदास, मायावती और कल्‍याण सिंह सरीखे मुख्‍यमंत्री भी हुए हैं। चौधरी चरण सिंह तो प्रधानमंत्री भी बने। रालोद के जनरल सचिव जयंत चौधरी का कहना है कि चंद गलत शक्‍तियों ने दो वर्गोंं के बीच खाई बनाने का काम किया था। अब वो गलतफहमियां दूर हो रही हैं। हम जिले-जिले में जाकर दोनों लोगों को मिलाने का काम कर रहे हैं। चुनाव ही नहीं आगे भी दोनों को मिलाने की ये कोशिश जारी रहेंगी।



    Last Updated On: 2017-01-11 14:37:02