• मुलायम के साथ जो हो रहा है वो कभी उन्होंने अपने गुरुओं के साथ किया था

    item-thumbnail  लगता है मुलायम सिंह यादव के पास अब न अपनी साइकिल बचेगी, न साइकिल पर सवारी करने वाले नेता. उन्होंने पार्टी को चुनाव आयोग तक पहुंचा दिया है. चुनाव आयोग के सूत्र बताते हैं कि आयोग पार्टी का चुनाव चिन्ह – साइकिल - फिलहाल जब्त कर लेगा. समाजवादी पार्टी का नाम फिलहाल न बेटे को मिलेगा, न पिता को।
     सवाल है कि आखिर मुलायम सिंह यादव ने ऐसा क्यों किया? अगर यह कहें कि समाजवादी पार्टी को अखिलेश यादव ने नहीं, मुलायम सिंह यादव ने ही तोड़ा तो गलत नहीं होगा. तीन दिनों यानी बहत्तर घंटों में छिहत्तर बार पार्टी को बचाने का मौका नेताजी को मिला. लेकिन मुलायम ने समाधान का रास्ता न चुनकर घमासान का रास्ता चुना और पार्टी को कुर्बान कर दिया. नेताजी के एक करीबी नेता बताते हैं कि मुलायम सिंह तीन दिन में अपनी ज़िंदगी की सारी जमा-पूंजी हार गए. अब सिर्फ उनके पास तीन विश्वस्त लोग ही बचे हैं - मुलायम खुद, छोटे भाई शिवपाल यादव और दोस्त अमर सिंह. यही वजह है कि मुलायम ने पांच तारीख को बुलाये गए सम्मेलन को टाल दिया है। जिस दिन मुलायम से सबकुछ छीना गया उससे एक दिन पहले अखिलेश यादव ने उनके सामने सीधा सा एक प्रस्ताव रखा था। लखनऊ में जब अखिलेश की ताजपोशी हुई तो बेटे ने मुलायम सिंह का पूरा खेमा ही उजाड़ दिया. जिन नेताओं के बेटों को उन्होंने टिकट दिया वे नेता भी अखिलेश यादव के साथ बैठे थे. एक पुराने समाजवादी नेता बताते हैं कि मुलायम के साथ वही हुआ जो मुलायम ने अपने दो गुरुओं के साथ किया था. उत्तर प्रदेश की सियासत में चौधरी चरण सिंह न होते तो मुलायम सिंह न होते. लेकिन एक वक्त आया जब उन्होंने चौधरी चरण सिंह की सियासी पूंजी अपने नाम कर दी और चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह को पार्टी से बाहर होने पर मजबूर कर दिया.
     दूसरी बार विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मुलायम को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया. मुलायम के कहने पर वीपी सिंह ने अपनी केंद्र की सरकार को दांव पर लगा दिया. लेकिन जब वफा दिखाने की बारी आई तो मुलायम सिंह ने उन्हें दगा दे दिया. मुलायम ने जो चरण सिंह और विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ किया वह इस बार अखिलेश ने मुलायम के साथ कर दिया. बस फर्क इतना है कि इस बार खून का रिश्ता है, उस बार गुरु शिष्य का रिश्ता था.
     पार्टी और परिवार बचाने के लिए मुलायम सिंह यादव को मौके तो खूब मिले. लेकिन वे न परिवार की नब्ज़ पकड़ पाए, न पार्टी की. जिस दिन मुलायम से सबकुछ छीना गया उससे एक दिन पहले अखिलेश यादव ने उनके सामने सीधा सा एक प्रस्ताव रखा था. अखिलेश के एक करीबी मंत्री के मुताबिक अखिलेश बस दों बातें मनवाना चाहते थे. अपनी पसंद के उम्मीदवार और अमर सिंह की पार्टी से छुट्टी. बेटे की बात मानने के बदले मुलायम ने उसे पार्टी से ही निकाल दिया. जानकारों के मुताबिक यह मुलायम की सबसे बड़ी भूल थी. समाजवादी पार्टी के एक नेता बताते हैं कि पिछले तीन महीने से अखिलेश और रामगोपाल यादव इसी दिन का इंतजार कर रहे थे, जब नेताजी खुद उन्हें पार्टी से निकाल दें.
    पार्टी से निकाले जाने के बाद भी अखिलेश यादव आज़म खान के साथ मुलायम सिंह से मिले. आज़म ने बाप और बेटे को रिश्ते का वास्ता दिया. मुलायम ने बेटे को पार्टी में वापस बुला लिया. लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. अखिलेश का गुट अगले दिन होने वाले सम्मेलन की तैयारी कर चुका था और मुलायम आखिरी बाज़ी हार चुके थे. अखिलेश और रामगोपाल यादव के सम्मेलन को रोकने की जितनी कोशिश मुलायम सिंह ने की, उतने ज्यादा लोग नेताजी का साथ छोड़ते चले गए.
    अखिलेश यादव के पास परिवार है, पार्टी के करीब-करीब सभी नेता उनके खेमे में हैं, बस पिता खिलाफ है
    परिवार के एक सदस्य के मुताबिक आखिर में मुलायम का कहना था कि परिवार के जिन भतीजों को उन्होंने संसद पहुंचाया वे भी अपने चचेरे भाई के साथ गए, चाचा के साथ नहीं. कुछ रिश्तेदारों को मुलायम ने खुद फोन किया. उन्हें रिश्ते और वर्षों की सियासी परवरिश का वास्ता दिया. लेकिन आखिर में मुलायम एकदम अकेले दिखे.
    लखनऊ में लड़ाई हारने के बाद मुलायम दिल्ली पहुंचे तो यहां भी सिर्फ दो लोग उनके साथ थे – शिवपाल यादव और अमर सिंह. अखिलेश यादव के पास परिवार है, पार्टी के करीब-करीब सभी नेता उनके खेमे में हैं, बस पिता खिलाफ है जो एक ऐसे रास्ते पर निकला है जिसमें बेटे और बाप दोनों की हार तय है.
    उत्तर प्रदेश के चुनाव का ऐलान बस होने ही वाला है. गिनती के दिन बचे हैं. मुलायम चुनाव आयोग में बेटे की शिकायत कर चुके हैं, अखिलेश जल्द चुनाव आयोग पहुंचकर साइकिल और पार्टी पर अपनी दावेदारी जतानेवाले हैं. साइकिल अब अदालत में भी जा सकती है और बाप-बेटों को अपनी नई पहचान ढूंढ़नी पड़ सकती है। उन्हें जानने वाले एक पुराने राजनेता कहते हैं – इस बार दंगल में पहलवान मुलायम ने ऐसा दांव लगाया जिसमें उनकी हार तय है. बड़े-बड़े दिग्गजों को चित करनेवाले नेताजी को इस बार उनके बेटे ने ही पटखनी दे दी. इससे उनका दिल भी टूटा और दल भी।



    Last Updated On: 03-01-17 08:36:39